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| मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब (Mirza Asad Ullah Khan Ghalib) |
Blog on Ghalib Poetry
मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ाँ Mirza Asad Ullah Khan Ghalib (1797- 1869) उर्दू शुअरा (poets) में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले और दाद पाने वाले शायर हैं. वे ख़ुदादाद सलाहियतों के मालिक थे. वह अपनी ग़रीबी और तमाम परेशानियों के बावजूद एक बेहद हस्सास इंसान थे. उनकी परवरिश उनके ननिहाल में हुई. अपने तालिब-इल्मी के ज़माने में ही शाइरी [poetry] शुरू कर दी थी. आगरा से आकर गली क़ासिम जान, दिल्ली के एक किराए के मकान में आ बसे.
मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ ज़िन्दगी-भर पढ़ाई लिखाई में मसरूफ़ रहे. ग़रीबी का आलम यह था कि कभी भी अपनी ख़ुद की किताब ख़रीद कर नहीं पढ़ सके. हमेशा किराए पर किताब मंगवाकर पढ़ते थे. सारी उम्र अपना ख़़ुद का मकान भी नहीं ले सके. उनके सात बच्चों में से कोई भी ज़िन्दा नहीं बचा, जिसका उन्हें ता-उम्र मलाल रहा. लिहाज़ा उन्होंने अपनी एक ग़जल में लिखा है...
पर यह बात भी सच है कि बेहद दुःख भरी ज़िन्दगी के बावजूद भी ग़ालिब की शख़्सियत बुलंद रही. अपनी तकलीफ़ को अपनी शख़्सियत पर कभी हावी नहीं होने दिया.
ग़ालिब [Ghalib] क़र्ज़ में डूबे रहने के बावजूद शराब-नोशी भी करते थे . मय-कशी के बारे में उन्होंने एक जगह लिखा है...
"कर्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रँग लाएगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन"
हालांकि एक जगह ग़ालिब [Ghalib] ने अपने इस ख़याल का इज़हार किया है कि उनके अंदर विलायत (सूफ़ी-सिफ़त इंसान होने) की सारी ख़ूबियाँ मौजूद हैं, सिवाय इसके कि वह शराब पीते हैं, लिहाज़ा उन्होंने फ़रमाया...
"यह मसाइले-तसव्वुफ़ यह तेरा ख़याल 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता"
ख़ुदा की ज़ात (ईश्वर) में उन्हें पूरा यक़ीन था, इसका इज़हार उन्होंने अपने शेर के एक मिसरे में बख़ूबी किया...
"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता..."
अपनी ज़ात को बेहद कमज़र्मफ बताते हुए उन्होंने अपने एक शेर में लिखा कि...
"मस्जिद के ज़ेरे-साया एक घर बना लिया है
यह बन्द-ए कमीना हमसाय-ए ख़ुदा है"
ग़ालिब ने ग़ज़लियात के अलावा क़तआत और क़सीदे वग़ैरह भी कहे हैं. ग़ालिब को ज्यादा मकबूलियत ग़ज़लों से ही मिली. उनकी मशहूर ग़ज़लों के अशआर मिसाल के तौर यहाँ पेश किये जा रहे हैं...
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ग़ालिब की शायरी की एक झलक (A glimpse of Ghalib Poetry)
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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
मोहब्बत
में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
"रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ
तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
यूँ ही गर रोता रहा 'ग़ालिब' तो ऐ अहले-जहाँ
देखना इन बस्तियों को तुम कि वीराँ हो गईं"
ग़ालिब [Ghalib] क़र्ज़ में डूबे रहने के बावजूद शराब-नोशी भी करते थे . मय-कशी के बारे में उन्होंने एक जगह लिखा है...
"कर्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रँग लाएगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन"
हालांकि एक जगह ग़ालिब [Ghalib] ने अपने इस ख़याल का इज़हार किया है कि उनके अंदर विलायत (सूफ़ी-सिफ़त इंसान होने) की सारी ख़ूबियाँ मौजूद हैं, सिवाय इसके कि वह शराब पीते हैं, लिहाज़ा उन्होंने फ़रमाया...
"यह मसाइले-तसव्वुफ़ यह तेरा ख़याल 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता"
ख़ुदा की ज़ात (ईश्वर) में उन्हें पूरा यक़ीन था, इसका इज़हार उन्होंने अपने शेर के एक मिसरे में बख़ूबी किया...
"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता..."
अपनी ज़ात को बेहद कमज़र्मफ बताते हुए उन्होंने अपने एक शेर में लिखा कि...
"मस्जिद के ज़ेरे-साया एक घर बना लिया है
यह बन्द-ए कमीना हमसाय-ए ख़ुदा है"
ग़ालिब ने ग़ज़लियात के अलावा क़तआत और क़सीदे वग़ैरह भी कहे हैं. ग़ालिब को ज्यादा मकबूलियत ग़ज़लों से ही मिली. उनकी मशहूर ग़ज़लों के अशआर मिसाल के तौर यहाँ पेश किये जा रहे हैं...
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ग़ालिब की शायरी की एक झलक (A glimpse of Ghalib Poetry)
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| मिर्ज़ा असद उल्लाह खान 'ग़ालिब' (Mirza Asad Ullah Khan Ghalib) |
अगर और
जीते रहते, यही इंतिज़ार होता
तेरे
वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी
से मर न जाते, अगर एतबार होता
कोई मेरे
दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को
ये ख़लिश
कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता
ये कहाँ
की दोस्ती है, कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़
होता, कोई ग़मगुसार होता
ये मसाईले-तसव्वुफ़,
ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे
हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता ********************************
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत
निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
निकलना
ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत
बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
हुई जिनसे
तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम
से भी ज़ियादा ख़स्तए-तेग़े-सितम निकले
उसीको
देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
कहाँ
मयख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
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दिले-नादाँ
तुझे हुआ क्या है
आख़िर
इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं
मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही
ये माजरा क्या है
मैं भी
मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो
कि मुद्दआ क्या है
जब कि
तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये
हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
हम को
उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं
जानते वफ़ा क्या है
जान तुम
पर निसार करता हूँ
मैं नहीं
जानता दुआ क्या है
मैंने
माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
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ग़ालिब के अदबी शाहकार
साल
|
अदबी कारनामा (उपलब्धियां)
|
1841
|
सय्यदुल अख़बार ने दिल्ली से दीवाने ग़ालिब का पहला एडिशन छापा
|
1845
|
फ़ारसी दीवान ‘मैख़ाने-आरज़ू’ के नाम से छपा.
|
1847
|
उर्दू दीवान का दूसरा एडिशन मंज़रे-आम पर आया.
|
1849
|
फ़ारसी किताब ‘पंज-आहंग’ छपी
|
ग़ालिब की शायरी की बेपनाह उपलब्धियों पर 1850 में बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने ‘नज्मुद्दौला दबीरुल्मुल्क निज़ाम’ लक़ब (सम्मान) से नवाज़ा. आगरा में जन्मे ग़ालिब का इंतक़ाल 1869 में दिल्ली में हुआ. उनकी क़ब्र ग़ालिब अकेडमी के बराबर बस्ती निज़ामुद्दीन में आज भी मौजूद है.
शोधकर्ता एवं सम्पादक
अंदाज़े बयाँ: मिर्ज़ा ग़ालिब
अंदाज़े बयाँ: मिर्ज़ा ग़ालिब
Mirza Ghalib
Urdu Shayri
ग़ालिब की शायरी से पूरी तरह लुत्फ़-अन्दोज़ होना चाहते हैं तो, https://www.amazon.in/Salahuddin-Ansari/e/B0859VGL3X… पर मौजूद किताब "अंदाज़े-बयाँ: मिर्ज़ा ग़ालिब" किन्डल एडिशन में दस्तयाब हैं.


